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घायल परिंदा

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   घायल परिंदा ओ घायल परिंदे! तू फिर से उड़ान भर। अपने सपनों को दे, नए हौसलों के पर।। टूटा नहीं है तू, हारा नहीं है अभी तक। अपनी कोशिशों से , हिम्मत कर उड़ान भर।। गगन चूम ले तू, अपने फैला कर पर। लड़खड़ा कर ही सही, दिखा दे कदम बढ़ा कर।। अपने जुनून से तू, दीवारें तोड़ सकता है। पत्थर को भी पिघला दे, तुझमें वो क्षमता है।। जाना है तुझे अभी तो, आसमां के भी पार। ठहरना नहीं है तुझे, मंजिल कर रही इंतज़ार।। ओ परिंदे ना भूल,  तू अभी जिंदा है। तूफानों से लड़ जाता, तू वही परिंदा है।। अपने वजूद की , तू खुद कर तलाश। रहना नहीं है तुझे, बनकर एक जिंदा लाश।। नई उम्मीदें , नए हौसलों के संग। ओ घायल परिंदे, तू फिर से उड़ान भर।। स्वाति सौरभ स्वरचित एवं मौलिक

मां (प्रार्थना)

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  माँ (प्रार्थना) मेरा मन तो है बेचैन  कैसे बंद करूं ये नैन? कैसे तेरा दर्शन पाऊं माँ, तुझमें ही मैं रम जाऊं माँ। कैसे करूं  मां तेरा वंदन? सब तेरा  करूं क्या अर्पण? क्या तुझे भोग लगाऊं माँ ? ये उलझन कैसे सुलझाऊं माँ ? ये दुनियां है भोग विलासी , मन मेरा भी है अभिलाषी । मैं तेरे चरणों की दासी माँ , मैं तेरे दर्शन को प्यासी माँ।। कभी पूजा पत्थर की मूर्ति, कभी तेरा चित्र बनाऊं माँ । तुम तो हो कण- कण में व्याप्त, अन्तर्मन में ही तुम्हें पाऊं माँ।। स्वाति सौरभ  स्वरचित एवं मौलिक

मेरे जीवन की चाह

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मेरे जीवन की चाह पैर हो जमीं पर,पर छू लूं आसमां, अपनी कलम से लिखूं अपना कारवां। सितारों की जहां में हो मेरा भी नाम भीड़ से अलग हो मेरी पहचान। सफर हो मुश्किलें  तो करूं सामना, हौसलों से हमेशा भरूं मैं उड़ान। नदी की धारा सी निरंतर बढूं मैं, आए जो बाधाएं तो भी डटकर चलूं मैं । पर्वत सी अटल और निश्चल रहूं मैं, आंधी तूफानों से निर्भीक लड़ूं मैं। सूर्य सा  फैलाऊं  मैं अपना प्रकाश, चन्द्रमा सी शीतलता भी  हो मेरे पास। चींटियों की तरह मै चढ़ूं सौ बार,  मानूं ना हार जो गिरूं बार बार। जाए ना द्वार से भिक्षुक कोई भूखा, मेहमानों को दूं हमेशा स्थान मैं ऊंचा। खुशियां हो जीवन में पर गम भी हो साथ, समझ सकूं उनका दर्द जो बांटे मेरे साथ। मिले जो सफलता पर हो ना अभिमान, स्वाभिमानी बनूं, पर ना करूं अपमान। तोडूं ना किसी की  खुशियों की कड़ी मैं, बनूं मैं सहारा किसी की  दुःख की घड़ी में। बस मेरे जीवन  की इतनी सी चाह, मेरा जीवन बने  प्रेरणा मैं रहूं या ना।         लेखिका:-स्वाति सौरभ       स्व...

दो मिनट

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  दो मिनट कितने दिन लग जाते हैं,एक जख्म के भर जाने में। किसी को दो मिनट नहीं लगता,जख्म को फिर हरा बनाने में।। कितने दिन लग जाते हैं,किसी का विश्वास जीत पाने में। किसी को दो मिनट भी नहीं लगता,भरोसे का कत्ल कर जाने में।। कितने दिन लग जाते हैं, किसी को अपना मुकाम बनाने  में। किसी को दो मिनट नहीं लगता,उसे अर्श से फर्श पर गिराने में।। कितने दिन लग जाते हैं,किसी का प्यार पाने में। किसी को दो मिनट नहीं लगता,उसका प्यार ठुकराने में।। कितने दिन लग जाते हैं, मेहनत से अपनी पहचान बनाने में। किसी को दो मिनट नहीं लगता,ईमानदारी को बिकाऊ बनाने में।। कितने दिन  लग जाते हैं, किसी को  इज्जत कमाने में। किसी को एक मिनट नहीं लगता,चरित्र पर उंगली उठाने में।। ये कैसा दुनिया का दस्तूर है,कोई पास होकर भी दूर है। कटघरे में खड़े है कई रिश्ते,रिश्तों का भी हो रहा अब खून है।।                 स्वाति सौरभ          स्वरचित एवं मौलिक

मां के नव - रूप

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  मां के नव- रूप नवरात्रि में मां नव- रूप धरे, हर रूप के अपने महत्व बड़े। प्रथम रूप बनी हिमालय पुत्री, मां कहलाई तुम शैलपुत्री। हुई मां तुम वृषभ पर आरूढ़, दाहिने हाथ में धरा त्रिशूल। मूलाधार चक्र में योगिजन, यहीं से साधना करते आरंभ। दूसरे स्वरूप में तप की चारिणी, कहलाई मां तुम तब ब्रह्मचारिणी। स्वाधिष्ठान चक्र में साधक का मन, रूप ज्योतिर्मय फलदायक अनंत। अर्धचंद्र मस्तक पर घंटा, तृतीय रूप कहलाई चंद्रघंटा। कल्याणकारी, चक्र मनीपुर स्वर्ण -सा चमके मां का स्वरूप। चौथे रूप से उत्पन्न ब्रह्मांड का, अतः कहलाई मां कूष्माण्डा। साधक के मन में अनाहत चक्र, मां तेरी उपासना सुगम , श्रेयष्कर। पांचवे रूप धरी स्कन्द की माता, मां कहलाई तुम स्कंदमाता। विशुद्ध चक्र कमल पर आसन देवी कहलाई तब पद्मासन। छठा कात्यायन पुत्री कात्यायनी, मां यह रूप अमोद्य फलदायिनी। आज्ञा चक्र अत्यंत महत्वपूर्ण, अलौकिक तेज युक्त तेरा रूप। सातवां रूप मां कालरात्रि, विघ्नविनाशक शुभ - फल दात्री। सहस्त्रार चक्र खुले सिद्धियों के द्वार, मां करती तब दुष्टों का विनाश। महागौरी मां तेरा आंठवा रूप, भक्तों के कलूष जाते हैं धूल। सिद्धिदात्र...

कामयाबी

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  कामयाबी जीवन में वो  मंजिल ही  क्या, जिसे पाना बहुत  आसान हो। छाले ना पड़े   पैरों में, ना जख्म के निशान हों।। कामयाबी के वो सपने ही क्या, आंखें सुजी, ना हुई लाल हो। जुनून हो बस कामयाबी की, चाहे दिन हो या रात हो।। वो जीत का मंजर ही क्या, जिसका किया ना इंतिजार हो। आंसू ना निकले आंखों से, करे खुशी का इजहार जो।। ना लिखे  सपने सैकत पर, जो मिट जाए गर तूफान हो।  लिखा है मंजिल पाहन पर, मिटता ना कभी निशान जो।। मिली वो पहचान ही क्या, जिसे बतानी बार - बार हो। चले पीछे - पीछे कारवां, करे तुम्हारी जय -जयकार जो।। स्वाति सौरभ स्वरचित एवं मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित