दो मिनट

 



दो मिनट


कितने दिन लग जाते हैं,एक जख्म के भर जाने में।

किसी को दो मिनट नहीं लगता,जख्म को फिर हरा बनाने में।।


कितने दिन लग जाते हैं,किसी का विश्वास जीत पाने में।

किसी को दो मिनट भी नहीं लगता,भरोसे का कत्ल कर जाने में।।


कितने दिन लग जाते हैं, किसी को अपना मुकाम बनाने  में।

किसी को दो मिनट नहीं लगता,उसे अर्श से फर्श पर गिराने में।।


कितने दिन लग जाते हैं,किसी का प्यार पाने में।

किसी को दो मिनट नहीं लगता,उसका प्यार ठुकराने में।।


कितने दिन लग जाते हैं, मेहनत से अपनी पहचान बनाने में।

किसी को दो मिनट नहीं लगता,ईमानदारी को बिकाऊ बनाने में।।


कितने दिन  लग जाते हैं, किसी को  इज्जत कमाने में।

किसी को एक मिनट नहीं लगता,चरित्र पर उंगली उठाने में।।


ये कैसा दुनिया का दस्तूर है,कोई पास होकर भी दूर है।

कटघरे में खड़े है कई रिश्ते,रिश्तों का भी हो रहा अब खून है।।

               स्वाति सौरभ

         स्वरचित एवं मौलिक


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