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वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई

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वीरांगना  रानी लक्ष्मीबाई                                   तीर्थ नगरी बनारस में,जन्मी एक असाधारण कन्या। अदम्य साहसी, छैल छबीली,मनु नाम की एक सुकन्या। विलक्षण प्रतिभा की धनी  ,साधारण नहीं वो नारी थी, बरछी, ढाल कृपाण से खेलती , करती घुड़सवारी थी। पेशवा बाजीराव के दरबार में ,उसने अपना बचपन बिताया, तात्या टोपे,नाना साहेब ने , तीरंदाजी,तलवारबाजी सिखाया। हुआ विवाह गंगाधर राव के साथ, मणिकर्णिका बनी महारानी, नाम पड़ा फिर लक्ष्मी बाई, मर्दानी कहलाई तब झांसी की रानी। जन्म दिया एक पुत्र को ,जो गया तुरंत स्वर्ग सिधार, लिया गोद एक  पुत्र,पर महाराज की सेहत में ना हुआ सुधार। निधन महाराज का असहनीय था पर, घबराई नहीं महारानी , दत्तक पुत्र के अधिकार के लिए, लड़ी झांसी की रानी । नहीं दूंगी अपनी झांसी,कर दिया खुलकर ऐलान, आई शामत अंग्रेजों की तब ,झांसी में जब छिड़ा संग्राम। बांध पीठ पर पुत्र दामोदर,होकर  अकेले घोड़े पर सवार, ...

छठ महापर्व

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  सूर्योपासना का अनुपम पर्व: छठ महापर्व                      कार्तिक मास में मनाया जाने वाला छठ महापर्व जो मुख्यतः प्रकृति की विशेषता को बताने वाला, साक्षात् भगवान रूपी प्रकृति की आराधना करने वाला अनुपम महापर्व है। मूर्ति पूजा से इतर ये पर्व बहुत ही अलग और विशेष महत्व रखता है। छठ पर्व में सूर्य,उषा, जल ,वायु, तथा सूर्य की बहन के रूप में छठी मैया की पूजा की जाती है। ये पर्व मुख्यत: बिहार राज्य में मनाया जाता है लेकिन धीरे- धीरे ये पर्व अब भारत के साथ साथ विदेशों में भी मनाया जाने लगा है।                   चार दिनों तक चलने वाला ये अनुष्ठान पृथ्वी पर जीवन देने वाले देवताओं को धन्यवाद और आशीर्वाद देने का अनुरोध करता है। हर त्योहार से अलग इस त्योहार की कई विशेषताएं हैं जो इस महापर्व को मानने हेतु सबको प्रेरित करती है।  छठ व्रत महिला, पुरुष दोनों ही करते हैं क्योंकि ये लिंग विशिष्ट त्योहार नहीं ...

उम्मीद के दीप

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  उम्मीद के दीप हाथों में मिट्टी के दीप, आंखों में लिए उम्मीद, ढूंढ़ती वो नज़र, मनेगी दीवाली मेरे भी घर, कोई खरीद ले मेरे दिए अगर, सब देख पलट जाते मगर। दिए खरीद लो बाबू जी, गरीब के घर भी जलेगा दीप, मानने के लिए ये त्योहार, कर रहे होंगे बच्चे इंतज़ार, ना आज मानूंगा हार, खाली हाथ ना जाऊंगा आज। मेरे बच्चों ना होना निराश, उम्मीदों का ही तो है ये त्योहार, हमारे घर भी जलेगा प्रकाश, दूर होगा जरूर अंधकार, खुद को दे रहा था दिलासा, जगा रहा था मन में आशा। सुबह से अब हो गई शाम, हर कोशिश हो गई नाकाम, अब हिम्मत रखना ना आसान, हे प्रभु! हो जा मेहरबान, घर कैसे आज जाऊंगा, आज क्या बहाने बनाऊंगा? मासूमों का टूट जाएगा दिल, भीगी नज़रें ना पाएंगी मिल, कितने में मुझे दोगे दीप? जग उठी दिल में उम्मीद, धुंधली नजर से देखा उसकी ओर, शायद भगवान का ही कोई रूप था वो। खरीद लिए सारे दीप, दिल से निकली दुवाएं भी, ले गया अपने संग, दे गया उनको उमंग, एक दीप खरीदें उनके भी, जिनकी उम्मीद टिकी है हम पर ही। स्वाति सौरभ स्वरचित एवं मौलिक

कफस में कनेरी

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  क़फ़स में कनेरी जाल बिछाया छलिया अहेरी, कहां समझी मैं नन्ही कनेरी? देकर मुझे अधम ने प्रलोभन, छीन लिया मेरा उन्मुक्त गगन। हो गई कफस में कैद, मां मैं ,झर - झर बहे मेरे नैन। ना भर सकती ,अब स्वच्छंद उड़ान, दफन हो गए ,क्षितिज के अरमान। कहते,सुना;   कनेरी सुन्दर गान, क्रंदन में ना निकलते, मधुर तान।। क्यों किया कफस में कैद? क्या थी मां हमसे बैर? बंद कफस में ना फैलते पंख, निराश हो जाता ये पुलकित मन। विरह वेदना किसे बताऊं? मौन रुदन कर खुद को समझाऊं। मान लिया है इसे ही नसीब, दुआ है ना मिले, ऐसी जिन्दगी कभी। आज़ादी की कभी दरख़्वास्त ना की,  इनकी ख़ुशी में जिन्दगी कुर्बान कर दी। देते हैं मुझे सब दाना पानी, उदास स्वर में ही पड़ती है गानी। ना आना मां तू इधर कभी,  वरना हो जाएगी कैद तू भी। ढूंढ़ती हूं तुझे मैं भर - भर नैन, विचलित मन रहता बेचैन। मां मैं ,हो गई कफस में कैद , नन्ही कनेरी ,है कफस में कैद।। स्वाति सौरभ स्वरचित एवं मौलिक भोजपुर,बिहार

ऐ वीरांगना!

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  वक्त चाहे कितना भी बदल जाए लेकिन औरत को अपने हक के लिए पहले खुद को साबित ही करना पड़ा है। अभी हाल में 17 वर्षों से चल रही लंबी कानूनी लड़ाई के बाद महिलाओं को सेना में बराबरी का हक मिला है। इस कानूनी लड़ाई में विपक्ष की ओर से दलील में महिलाओं की शारीरिक,मानसिक क्षमताओं पर सवाल उठाए गए थे। जिसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि सरकार अपनी मानसिकता बदले। हम महिलाओं पर एहसान नहीं कर रहे , उन्हें उनका हक दे रहे हैं। इसी जीत की खुशी में और अपनी वीरांगनाओ को समर्पित है मेरी एक छोटी सी रचना ।         ऐ वीरांगना ! ऐ वीरांगना! तेरी ना हो केवल कोमल छवि! अब  जवाब देने की, आ गई है  घड़ी।।  तेरे शारीरिक क्षमताओं पर, जो उठा रहे सवाल हैं! एक औरत के मां बनने का , दर्द का भी एहसास है? जो लड़ जाती है मौत से, ममता के प्यार में। दिखा दे उनको आज तू, कितनी ताकत है तेरे वार में! ऐ वीरांगना! तेरी ना हो केवल ममतामयी छवि तेरे करुण भाव को,  समझ रहे कमजोर कड़ी।। तेरे मानसिक क्षमताओं पर,  उठा रहे सवाल हैं! दो कुलों के मान रखती, जिम्मेदारियों ...

चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई

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   चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई फैलाकर अपने पंख जमीं से, उड़ना अभी तो सीख रही थी। गगन चूमने के अरमान जगाती, कोशिशें लगातार कर रही थी। पर निर्मोही के हाथों पकड़ी गई,  चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई।  आसमां में उड़ान भरने को,  पंख अपने  फड़फड़ा रही थी। चंगुल से मुक्ति पाने को, निरीह चिड़िया छटपटा रही थी। नौमीदी में  निराश हो गई,  चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई। पिंजड़े से वो झांक रही थी, आसमां को निहार रही थी। ख्वाबों में आजादी बची थी, जंजीरें गुलामी की बंधी थी । उड़ना भी अब भूल गई, चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई। चहकना भी अब छोड़ दिया , हालात से समझौता कर लिया। गुमसुम सी उदास रहने लगी, आंखों से अश्रु धारा बहने लगी। जुबान अब खामोश हो गई,  चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई। स्वाति सौरभ स्वरचित एवं मौलिक