चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई

 

 चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई


फैलाकर अपने पंख जमीं से,

उड़ना अभी तो सीख रही थी।

गगन चूमने के अरमान जगाती,

कोशिशें लगातार कर रही थी।

पर निर्मोही के हाथों पकड़ी गई,

 चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई।


 आसमां में उड़ान भरने को,

 पंख अपने  फड़फड़ा रही थी।

चंगुल से मुक्ति पाने को,

निरीह चिड़िया छटपटा रही थी।

नौमीदी में  निराश हो गई,

 चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई।


पिंजड़े से वो झांक रही थी,

आसमां को निहार रही थी।

ख्वाबों में आजादी बची थी,

जंजीरें गुलामी की बंधी थी ।

उड़ना भी अब भूल गई,

चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई।


चहकना भी अब छोड़ दिया ,

हालात से समझौता कर लिया।

गुमसुम सी उदास रहने लगी,

आंखों से अश्रु धारा बहने लगी।

जुबान अब खामोश हो गई,

 चिड़िया पिंजड़े में कैद हो गई।


स्वाति सौरभ

स्वरचित एवं मौलिक




टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्मीद के दीप

कामयाबी