मां के नव - रूप

 मां के नव- रूप


नवरात्रि में मां नव- रूप धरे,

हर रूप के अपने महत्व बड़े।

प्रथम रूप बनी हिमालय पुत्री,

मां कहलाई तुम शैलपुत्री।


हुई मां तुम वृषभ पर आरूढ़,

दाहिने हाथ में धरा त्रिशूल।

मूलाधार चक्र में योगिजन,

यहीं से साधना करते आरंभ।


दूसरे स्वरूप में तप की चारिणी,

कहलाई मां तुम तब ब्रह्मचारिणी।

स्वाधिष्ठान चक्र में साधक का मन,

रूप ज्योतिर्मय फलदायक अनंत।


अर्धचंद्र मस्तक पर घंटा,

तृतीय रूप कहलाई चंद्रघंटा।

कल्याणकारी, चक्र मनीपुर

स्वर्ण -सा चमके मां का स्वरूप।


चौथे रूप से उत्पन्न ब्रह्मांड का,

अतः कहलाई मां कूष्माण्डा।

साधक के मन में अनाहत चक्र,

मां तेरी उपासना सुगम , श्रेयष्कर।


पांचवे रूप धरी स्कन्द की माता,

मां कहलाई तुम स्कंदमाता।

विशुद्ध चक्र कमल पर आसन

देवी कहलाई तब पद्मासन।


छठा कात्यायन पुत्री कात्यायनी,

मां यह रूप अमोद्य फलदायिनी।

आज्ञा चक्र अत्यंत महत्वपूर्ण,

अलौकिक तेज युक्त तेरा रूप।


सातवां रूप मां कालरात्रि,

विघ्नविनाशक शुभ - फल दात्री।

सहस्त्रार चक्र खुले सिद्धियों के द्वार,

मां करती तब दुष्टों का विनाश।


महागौरी मां तेरा आंठवा रूप,

भक्तों के कलूष जाते हैं धूल।

सिद्धिदात्री मां की नौवीं शक्ति,

सारी मनोकामनाएं मां पूर्ण करतीं।


स्वाति सौरभ

स्वरचित एवं मौलिक






टिप्पणियाँ

Chaman Lal ने कहा…
यदा यदा ही धर्मस्य
ग्लानिर्भवति भारत।।
अभ्युत्थानं धर्मस्य
तदात्मानं सृजयाम्यहं।।
धरती पर जब जब धर्म की ग्लानि होती है और अधर्म को बढ़ावा मिलता है, तब तब धर्म के उत्थान और पुनर्स्थापना के लिए परमात्मा अपने को सृजित करते हैं।
यह उस समय की बात है जब धरती पर दानवी शक्ति अत्यधिक प्रबल हो गई थी और दैवी शक्ति क्षीण हो गई थी, सर्वत्र दानवों का अत्याचार चरम पर था।देवताओं में घोर निराशा थी, वैसे समय में आदि शक्ति माता वैष्णवी इस धारा पर दानवों का संहार कर धर्म का विजय पताका फहराने हेतु अवतरित होतीं हैं।
अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित कर धरा का कल्याण करतीं हैं।उसी उपलक्ष्य में हम नवरात्री का पर्व मनाते हैं।
श्रद्धेय कवयित्री "स्वाति सौरभ" की यह काव्यरचना "माँ के नव-रूप" में आदि शक्ति माता के नौ रूपों का बड़ी ही मनोहारी और सुसज्जित विवरण प्राप्त होता है। कवयित्री ने बड़ी ही सहजता से आदि शक्ति माता के प्रत्येक रूप के साथ मानव शरीर उपस्थित चक्र का वर्णन किया है। इस काव्यरचना में में जो प्रमुख बात है ,वह है- योग साधना की पद्धति।
माँ का पहला रूप हिमालय पुत्री या शैलपुत्री है। माँ इस रुप में माँ वृषभ यानि सांड पर सवार होती हैं और दाएँ हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं।
इस रूप की साधना में योगी अथवा साधक का मन 'मूलाधार चक्र'में होता है।मूलाधार शरीर का सबसे बुनियादी चक्र है।इस चक्र के जागृत होने से साधक को स्थिर देह, मादकता और उच्चबोध जैसी सिद्धि प्राप्त होती हैं। कर्म सिद्धान्त के अनुसार यह चक्र प्राणी के भावी प्रारब्ध को निर्धारित करता है।
इसके देवता हैं-पशुपति महादेव।
प्रतिनिधि पशु है-सात सूडों वाला हाथी, जो बुद्धि का प्रतीक है। तत्व-पृथ्वी। रंग-लाल, जो शक्ति का प्रतीक है।इसीलिए माता के इस रूप को आदि शक्ति कहते हैं।
कलश-स्थापना के बाद माँ शैलपुत्री का स्तवन इस मन्त्र से किया जाता है-
वन्दे वांछित लाभाय,
चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढां शूलधरां,
शैलपुत्री यशस्विनीम।।
इस कविता में वर्णित माँ के अन्य रूपों का वर्णन मैं अपनी अगली टिप्पणी में जरूर करूँगा।तब तक श्रद्धेय कवयित्री को मैं ऐसी उत्कृष्ट रचना हेतु हार्दिक साधुवाद देता हूँ।
श्रद्धावनत।

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